चमचो का सफर

या तो हम पढ ही नहीं पा रहे थे फिर हम जो पढने लगे तो कुछ चमचे भी पैदा हो गए जो सवर्ण लोगो से जा मिले तब भी वो सवर्ण लोगो के बराबर नहीं हो सके कोई छूत की बीमारी उन मे बनी रही खैर इस पर मैं बाद मे आता हूँ. सवाल ये है की दलित से चमचा बनने का सफर कैसे शुरु होता है ? ये लोग क्या कुछ करते हैं ?

पहली तो बात ये की इसकी जड ज्ञान की कमी और उसके होने का भ्रम है. जी हाँ अशिक्षित या तो बाबा साहेब को जानता ही नहीं है, अपने अधिकारों को नहीं जानता उसके हिसाब से सब भाग्य का खेल है और अगर वह बाबा साहेब को मानता है तो पूरे दिल से. पर शिक्षित जैसे जैसे और हायर एजुकेशन लेता है वो नकारना शुरु कर देता है. कितने ही आईएएस, आईआरएस, डाक्टर , इंजीनियर इत्यादि बीजेपी जैसी अम्बेड़कर विरोधी पार्टीयों मे बैठे हैं. ये सब अचानक एक दिन नहीं हो गया.
ये लोग बाबा साहेब अम्बेड़कर को सिर्फ संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष ही मानते हैं. इस के बाद वह बाबा साहेब द्वारा किए गए अन्य कार्यो को नकार देते हैं. जैसे मेरा एक व्यक्ति से सामना हुआ तो मैने उन्हे बाबा साहेब द्वारा आरबीआई, लेबर एक्ट, बाँध परियोजनाओं जैसे हीराकुंड, दमोदर घाटी, ग्रिड़ सिस्टम, वैधानिक हड़ताल का अधिकार इत्यादि के बारे मे बताया तो उन महाशय ने सब को एक बात से खारिज कर दिया “तुम हर बात पर अम्बेड़कर का लेबल क्यों लगा देते हो. ” ये भी मेरी आपकी तरह दलित ही हैं, महाशय एम.ए. कर रहे हैं इकोनोमिक्स मे. अब इनको लगता है की ज्यादा ज्ञानी हैं. इन्होंने बाबा साहेब की एक भी किताब नहीं पढी हुई होती है फिर भी ये उनके कामों को खारिज कर देते हैं. जब मैने पूछा की कोई एक वजह बता दो जिससे मैं मान लूँ की भारतीय नोट पर मि. गांधी की ही फोटो होनी चाहिए. क्या योगदान है उनका भारतीय अर्थव्यवस्था मे . वो नहीं बता सके. क्या परेशानी है अगर उनको मज़दूरों का उत्थान कर्ता कहा जाता है ? क्या दिक्कत है अगर वो हर तबके के नायक हैं ? बाबा साहेब ने हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ जरूर किया है चाहे वह कोयले की खान का मज़दूर हो, रेलवे का मजदूर हो, अधिकारी हो या कोई और. पर कुछ ज्ञानीजन चार अक्षर पढ कर कुछ लोग ज्ञान पेलने निकल पड़ते हैं.
ये दिक्कत उन लोगों मे मुख्यत: शुरु होती है जो हायर एजुकेशन ले रहे होते है. ऐसा क्यों ?  ज्ञान का भ्रम है और कुछ नहीं. उन्हे लग रहा होता है की उन जैसा दृष्टिकोण बाकी अन्य अम्बेड़करवादी या दलितों के पास नहीं है. ये लोग यह तक कह देते हैं की अम्बेड़कर न होते तो क्या हम भी नहीं होते? अम्बेड़कर न होते तो क्या हम चौदह घंटे ही काम करते ? चीजें बदल रही हैं..इत्यादि. फिर मुझे बताना पड़ता है की पैदा तो हम दलित हजारों सालों से होते रहे हैं पर जीते और मरते हम जानवरों की तरह ही आए हैं. पर सम्मान से जीने का अधिकार मिला तो बाबा साहेब की वजह से. हर वह काम जो बाबा साहेब ने किया उसका श्रेय सिर्फ बाबा साहेब को ही मिले. जिसे शर्म है वो अधिकारी या कर्मचारी छोड़ दे डीए को, विरोध करे वेतन इनक्रिमेंट का, विरोध करे मेडिकल सुविधाओं का. क्या क्या कर सकते हैं ये ज्ञानीजन ? सरकार या सेठ ओवर टाइम का पैसा न दे तो क्यों बैठ जाते हैं हड़ताल पर ? ये दलित ज्ञाता जानते भी थे मानव अधिकारों के बारे में ? हम लेबल लगाने वाले कौन होते हैं, सूरज को ढका जा सकता है ? उसके अस्तित्व को नकारा जा सकता है ? हम कृतज्ञ हैं उनके और रहेंगे. ये उस विद्वान को पढ़ते तब न कुछ समझ पाते. बहस मे ये आप को पागल तक भी करार दे देते हैं, कोई बडी बात नहीं. पर ये भी चलेगा. ये ही ज्ञानीजन या दलित छात्र कालांतर में चमचे बनते हैं. इनकी ये मूर्खता ज्यादा खतरनाक है,  जैसे घर का भेदी. कुछ के होश तो ऊँची पढ़ाई की एक रस्म ही ला देती है जिसे वायवा कहते हैं, कहीं कहीं यही काम सत्रांक कर देते हैं जहाँ इन के ज्ञान को चोट लगती है. छोटे कर्मचारियों की बात करने का तो मतलब ही नहीं बनता क्योंकि बडे अधिकारी ही रोते बिलबिलाते पाए जाते हैं. कुछ चमचागिरी करके सेवानिवृत्त हो लेते हैं और कुछ चमचागिरी की कमाई से एमएलए या एमपी हो जाते हैं फिर ये शो-केस के गुड्डे की तरह पडे होते हैं कोने में. बहुत बार मंच पर इनका हाथ झटक दिया जाता है, इन्हे छोड़ कर सब के गले मे माला डाली जाती है. यानी अछूत अब भी अछूत ही है. कभी कभी इन्हे भूल का एहसास हो जाता है पर इससे पहले ये वो खतरनाक काम कर देते हैं जिसे कहते हैं जड़ खोदना. जी हाँ जो आधा ज्ञान था इनको वो ये औरों को भी पिला चुके होते हैं. आप बाहर वाले दुश्मन से आराम से जीत सकते हैं बजाय घर के विभीषण से. इसलिए हर मौके पर ऐसे चमचो को जवाब देने के लिए तैयार रहें.
मेरा मानना है ये जो ज्योति जली है ज्ञान की और स्वाभिमान की वह किसी भी हालत मे न बुझे. हमारे बहुत सारे मित्र शानदार काम कर रहे हैं, आशावादी हूँ बेहतरी के लिए. शिक्षित होते रहिए, संघठन मे रहेंगे तो आसानी रहेगी संघर्ष करने मे.

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