सत्ता सत्ता और सत्ता

आप को लगता है आप डूब रहे हैं. तिनके को पकडने की खुश किस्मती मे आप को जहाज मिला आप खुश. आपने तुरंत मौका लपक लिया. किनारे पहुचने की उम्मीद बँधी है. चलो अच्छा है. पर आप का फर्ज ये भी था की आप पहले ये पता करते की जहाज मे सब कुछ ठीक – ठाक हो. क्या वाकई ये जहाज आपको उस पार लेजा सकेगा ? 

कुछ ऐसी ही हालत है काँग्रेस की, जिसका दामन उस ने थामा है उसकी खुद की  हालत खराब है. अच्छा तो ये होता काँग्रेस खुद अपने बल बूते चुनाव लडती. नोटबंदी के बाद जिस तरह से काँग्रेस ने इसका विरोध किया था, लग रहा था काँग्रेस मजबूत हो रही है. राहुल गांधी को पूरी तैयारी के साथ देखा गया. अगर सच मे ऐसा ही था तो फिर क्यों उन्होने गठबंधन किया और वो भी उस पार्टी के साथ जिसके राज को गुंडाराज बोला जाता रहा है. क्या राहुल गांधी का आत्म विश्वासइस पिछले लोक सभा चुनाव की वजह से बुरी तरह से टूट चुका है. इस जगह आत्म विश्वास बसपा का सराहा जाना चाहीए. “सबका साथ” हम टिकट वितरण मे देख सकते हैं. उन्होने हर समाज और वर्ग का ध्यान रखा है.

बीजेपी अपनी नाव मे ज्यदातर बागी और दागी को लिये बैठी है. सपा और बीजेपी मे वंशवाद का भी बहुत जोरों पर है, वह भी तब जब एक समाजवादी और दूसरी खुद को वंशवाद का घोर विरोधी बताती है. पिता पुत्र की नाटकबाजी को सभी ने देखा है, विकास की बात नही हुई.

भले ही लोग समझे की गठबंधन बीजेपी को हराने के लिये किया गया है.  पर असल मे ऐसा बसपा को हराने के लिये किया गया है. पिछले चुनाव मे “अखिलेश” सरकार को 29 % और काँग्रेस को 11 % वोट मिले थे. इस गणित से तो गठबंधन सफल हो सकता है पर चुनाव गणित से ज्यादा केमस्ट्री का मामला है. बसपा  पिछले चुनाव मे 4 % वोटो से हारी थी. और अभी के माहोल से पता चलता है की मायावती  दलित, मुस्लिम, सवर्ण सभी के वोट लेने मे कामयाब रहेंगी और बहुमत से सरकार बना लेंगी, या फिर भाजपा अपने दांव पेच से इस चुनाव मे धमाका कर पाएगी. अगर बीजेपी बिहार और दिल्ली के बाद यूपी मे कुछ खास नही कर पाती है तो उसे मान लेना चाहीए की ‘मोदी सुनामी’ जैसा अब कुछ नही बचा है. काँग्रेस दो दर्जन सीटो पर बहुत ही कम अंतर से हारी थी इस लिये बस उसे थोडी ओर मेहनत की जरुरत है.

गठजोड कितना फायदेमंद यह तो समय ही बताएगा परन्तु सत्ता के लिये काँग्रेस ने विचारों की बलि दी है. काँग्रेस भूल सकती है पर जनता नही. मुजफ्फर नगर के दंगे थे साथ ही सरकार सैफई मे रंग रलियां मना रही थी. लेपटोप बाँट देने से जनता को रोजगार नही मिल जाता. 

पर चुनाव का मौसम है पाले बदलने का दौर जारी है. समझदारी जनता को दिखानी है. हम उम्मीद करते हैं ये जनता द्वारा चुने हुए लोग जनता के लिये भी होंगे.

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