सहारनपुर और ​कुन्ठा की गठरी 

महिलाओं पर हथियार उठाने को शान समझते हो ? वो महिलाएं निहत्थी थी वरना खाल उधेडना और उसके जूते बनाना भी दलित खूब जानते हैं. देश को गुलाम बना देने वाले ये राजपूत दरअसल आज कुछ भी नहीं हैं सिवाए कुन्ठा की एक गठरी के. ये लोग जानते हैं अपनी ऐतिहासिक गलतियां, उसी का अपराध बोध इन्हे दिन रात खाए जा रहा है. सत्ता चली गई, ताकत चली गई, शान चली गई. सत्ता के लिए अपनी बहन बेटियों का सौदा करने वाले ये दलाल झूठी शान के लिए अकड का सहारा लेते हैं. बहुत बार हम देखते हैं की दलित दूल्हे को घोडी पर चढने से रोक दिया गया, ये क्या है ? झूठी अकड़ ही तो है. इन्हे लगता है सब सुख संसाधन इनके हैं कोई दलित उनका उपयोग कर ही कैसे सकता है. सहारनपुर में दलितों पर हमला भी कुन्ठा के मवाद का प्रस्फुटन ही है. न जाने कितने वर्षों से जोड जोड कर रखी नफरत को उन्होने तलवार के सहारे बाहर निकाला. महिलाओं के हाथ पाँव काट दिए गए, उनकी छाती काटने के लिए भी उनपर वार किया गया. पानीपत कुछ ज्यादा दूर नहीं सहारनपुर से जहाँ इन्ही तथाकथित भारत माता के सपूतो ने देश को गुलामी की ओर धकेला था. न्यौता देकर बुलाया था मुगलों को, फिर उन्ही से युद्ध में हार गए, क्या इसे ही रणनीति कहते हैं ये लोग ? क्या यही है वो इतिहास जिस पर ये गर्व करते हैं ? कई साल लग जाते हैं एक घर बनाने में पर इन्होंने कई घर जला दिए, क्या यह मानवीय कृत्य कहा जा सकता है ? इसके लिए यही समय क्यों चुना गया क्योंकि पहला तो मुख्यमंत्री का खुद का आपराधिक रिकॉर्ड बडा जबरदस्त है दूसरा मुख्यमंत्री खुद ठाकुर है. मेंढक  जैसे बरसात के दिनों में नालों से निकल आते हैं और खूब उछलते फिरते हैं वैसे ही सारे गुंडे, मवाली, जातिवादी आतंकी बिलों से निकल आए हैं, वहाँ माहौल जश्न का सा है. जो कर सकते हो कर लो अपनी सरकार है, ऐसा उन्हे लगता है. भीषण मार काट के बाद भी दलितों ने अहिंसा से काम लिया यदि यही मार काट दलितों ने शुरू की होती तो सारी ताकतें दलितों पर टूट पड़ती. यूपी के साथ साथ कई राज्यों मे इनका आतंक शुरू हो जाता. इसके बाद जब भीम आर्मी ने मुआवजे व अपराधियों पर कार्यवाही की मांग की तो उसका संबंध नक्सलियों से बताया गया. पूरी घटना को मनुवादी मीडिया द्वारा छुपाया गया. 21 मई को जब दुनियाभर का मीडिया दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर बहुजनों के आक्रोश को कवर करने गया था तब भी हमारे देश का मीडिया मोदी और योगी के गुण गान  में व्यस्त था. पर इस सब के बावजूद हम वहाँ जिस संख्या मे पहुचे देखकर बहुत खुशी हुई. फिर अगले दिन मायावती सहारनपुर जाती हैं उस दिन फिर से ये घात लगा कर बैठे पीठ पर वार करने वाले बाहुबली, दलितों पर हमला बोल देते हैं. मुझे लगता है की एक तो इनके निशाने पर खुद मायावती थीं और दूसरा ये की ठाकुर ये बताना चाहते थे की वो फिर से ये आतंक का खेल दोहरा सकते हैं. इस दिन से मीडिया ने खबर देना शुरू किया है क्योंकि ऐसा कर के मायावती पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया जा रहा था. टीवी पर कहा जा रहा था की क्या जरूरत थी मायावती को इस समय वहाँ जाने की ? तो मैं पूछना चाहता हूँ की दुख की घड़ी में वो अपने लोगों से नहीं मिलती तो कब मिलती ? किसी भी भारत के नागरिक को अधिकार है वो कहीं भी आ जा सकता है तो फिर उन्हे क्यों रोका जाए ? बल्कि सवाल तो  यूपी सरकार से होना चाहिए था की फिर से हत्याएँ हुई तो हुई कैसे ? इसके बाद राहुल गांधी सहारनपुर जाने को निकलते हैं. उन्हे रास्ते में रोक दिया जाता है, क्यों? योगी सरकार क्या छिपा रही है ? सब को पता है जो भी घटना सहारनपुर में घटी सब प्रशासन की मिलीभगत थी. क्योंकि तलवार लहराते ये आतंकी कई तस्वीरों में पुलिस के साथ देखे गए थे फिर भी उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई. अब सारे षडयंत्र पर पर्दा डाला जा रहा है और हमारे 56 इंच की छाती वाले प्रधानमंत्री को मैं मैं करने से ही फुर्सत नहीं मिली की वे दलितों को झूठी दिलासा भी दे सके, ये और बात है की वे मैनचेस्टर बम ब्लास्ट पर संवेदना व्यक्त करते हैं. वे दलितों को छोड़ कर बाकी सब के लिए संवेदनाएं रखते हैं, विश्व नेता बनना चाहते हैं. मुझे इन मनुवादियों से बिल्कुल भी उम्मीद नहीं आप भी नहीं करें. हम संख्या बल में इतने हैं की हम अगर ठान लें तो कुछ भी कर सकते हैं.

हर बार की तरह इस बार भी इस मामले को कोर्ट ले जाया गया है मुझे संविधान पर तो भरोसा है पर उन काले चौगे वाले दलालों पर बिल्कुल भी नहीं. इस आतंकी घटना से क्षुब्ध दलित धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म अपना रहे हैं जो की एक अहिसंक कदम है और मैं निजी तौर पर इसका समर्थन करता हूँ. और ये चेतना जो आप सब ने जन्तर-मन्तर पर दिखाई वो खोनी नहीं चाहिए. ध्यान रहे शहर में आग लगी है अगला घर किसी का भी हो सकता है.

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दलित, बहादुर और भ्रष्टाचार

विधानसभा मे बैठ कर पोर्न देखना पाप नहीं है, अपराध नहीं है. यह किया जा सकता है. नेता सब कानूनों से ऊपर हैं इस देश में. जवान को समझना चाहिए था की ड्यूटी पर मोबाइल नहीं रखना होता है, और रखना भी है तो बिना दाल वाली दाल और उच्च कोटि  के अतिस्वादिष्ट खाने का वीडियो तो नहीं ही बनाना था. ये मामला खाना बनाने की विधि को भी लीक करता है जो की सेना की गुप्त जानकारी हो भी हो सकती है और शायद दुश्मन इसका फायदा भी उठा सकता है. तो इस तरह यह बहादुर तेज बहादुर यादव द्वारा किया गया जघन्य अपराध है. परिणामस्वरूप उनको घर भेज दिया गया. बहादुर तेज बहादुर साहब ने पूरा वीडियो सेना के बडे अधिकारियों के भ्रष्टाचार को दिखाने के लिए बनाया था. पर बहादुर तेज बहादुर साहब को समझना चाहिए की भ्रष्टाचार से पीएम लड रहे हैं छप्पन इंच की छाती लेकर, बहादुर साहब ने तो सिर्फ आतंकियों से ही तो लड़ना है, करना क्या है गन सरकार ने दी ही है उठानी है और चलानी है बस. जवान माइनस तापमान में रहे या झुलसा देने वाले तापमान में दाल तो बिना दाल ही खानी पड़ेगी. लाला रामदेव भी बोलते हैं पतली दाल खाने से हाजमा ठीक रहता है. सैनिक बन्धूओं धन्यभागी हो के पानी से ही नहीं खानी पड रही है चपाती. दिक्कत क्या है तुम्हारे हिस्से की रसद सामग्री बेच कर साहब लोग अगर चार पैसे कमा लेते हैं, क्या हुआ जो तुम को भूके पेट सोना पड रहा है. यही देश हित है, बोलोगे तो देशद्रोही कहलाओगे, पाकिस्तान का वीजा मिलेगा सो अलग. हाँ शहीद होते हो तब ही माना जाएगा की देश भक्त हो. उसके लिए जान देनी पड़ती है उसके लिए गन उठानी पड़ेगी तो चलो गश्त पर न जाने कौन सी गोली तुम्हारा इंतजार कर रही है.यानी छूट गया पीछा घटिया खाने से और यहाँ तो हाईकोर्ट जज की ही हालत खराब है तो सैनिक की तो सुने ही कौन.

कुछ ऐसा ही कलकत्ता हाईकोर्ट वाले दलित जज कर्नन साहब ने कर दिया. बोले पीएम से की सीजेआई समेत सात जज भ्रष्ट हैं कार्यवाही करो. सीजेआई ने उन से सारे अधिकार छीन लिए और जमानती वारंट भी निकाल दिया जज कर्नन के नाम का. फिर कर्नन साहब ने उन सातों जजो के विदेश जाने पर रोक लगा दी. बात बढती जा रही है नौबत कर्नन साहब की मानसिक जांच तक आ गई है. यही तो होगा जब कोई दलित मनुवादियों से पंगा लेगा. बहादुर तेज बहादुर हों या जज साहब दोनो ही ने व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार को हटाने की बात की है. पर मिला क्या ? जांच इन ही के खिलाफ चल रही है. घर भी ये ही बैठे हैं. सीजेआई पर तो वैसे औरों ने भी उंगली उठाई है, कहते हैं की उनके सुपुत्र ने फैसला करवाने की एवज में पैसा लिया है. पर यह चलता है इस देश में. बडा अधिकारी पैसा खाए चलता है, पर एक बाबू बीस रुपये की रिश्वत में नप जाता है. पर चलता है. कर्नन साहब सच बोलते हैं तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हो जाती है, जज को पकड़ने के लिए पुलिस कई गाड़ियाँ लेकर पहुंच जाती हैं जैसे वीरप्पन को पकड़ने निकले हैं. भ्रष्टाचार की शिकायत करना गुनाह-ए-अजीम है इस देश में. और आप को बता दूं की हाइकोर्ट के जज साहब पर महाभियोग ही चल सकता है और वह संसद का काम है और राज्यसभा में प्रस्ताव गिर जाएगा. उसके बाद जज कर्नन फिर से अपने काम से जुड जाएंगे और यही सीजेआई और बाकी का मनुवादी तंत्र नहीं चाहता इसलिए सीजेआई साहब ने कानून को कुचलना ही ठीक समझा क्योंकि अगर कर्नन साहब की बात मान ली जाए तो अच्छे अच्छो की जो है पतलून उतरने में टाइम न लगेगा. पर ये सब नहीं चलने वाला, छोटा जज बडे जज को भ्रष्ट कहे तो पेल दिये जाएंगे. लड़ाई ऐतिहासिक है हर बार की तरह. जिगर शेर का चाहिए ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए. जज साहब को पागल करार देने की योजना चल रही है, फिर आगे ? ये मनुवादी पूरी ताकत से दलित जज को दबाएंगे और क्या. कर्नन साहब के साहस की प्रशंसा से ही काम नहीं चलने वाला उन्हे साथ की जरुरत है और वो बहुत थोडे ही लोग कर रहे हैं. ज्यादातर सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा मामला देख दूर भाग रहे हैं उन से की कहीं माननीय सुप्रीम कोर्ट के गुस्से का शिकार वे खुद न हो जाएं. कोई खुल के नहीं कहता की वो जज कर्नन साहब के साथ है. उनकी मानसिक हालत पर सवाल करना क्या दलितों का अपमान नही ? है तो उठते क्यों नहीं ? हमारा छात्र स्कूल मे परेशान, कर्मचारी और अधिकारी ऑफ़िस में और जज कोर्ट में, क्यों ? सोचो , पूछो खुद से. 

 चमचो का सफर

या तो हम पढ ही नहीं पा रहे थे फिर हम जो पढने लगे तो कुछ चमचे भी पैदा हो गए जो सवर्ण लोगो से जा मिले तब भी वो सवर्ण लोगो के बराबर नहीं हो सके कोई छूत की बीमारी उन मे बनी रही खैर इस पर मैं बाद मे आता हूँ. सवाल ये है की दलित से चमचा बनने का सफर कैसे शुरु होता है ? ये लोग क्या कुछ करते हैं ?

पहली तो बात ये की इसकी जड ज्ञान की कमी और उसके होने का भ्रम है. जी हाँ अशिक्षित या तो बाबा साहेब को जानता ही नहीं है, अपने अधिकारों को नहीं जानता उसके हिसाब से सब भाग्य का खेल है और अगर वह बाबा साहेब को मानता है तो पूरे दिल से. पर शिक्षित जैसे जैसे और हायर एजुकेशन लेता है वो नकारना शुरु कर देता है. कितने ही आईएएस, आईआरएस, डाक्टर , इंजीनियर इत्यादि बीजेपी जैसी अम्बेड़कर विरोधी पार्टीयों मे बैठे हैं. ये सब अचानक एक दिन नहीं हो गया.
ये लोग बाबा साहेब अम्बेड़कर को सिर्फ संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष ही मानते हैं. इस के बाद वह बाबा साहेब द्वारा किए गए अन्य कार्यो को नकार देते हैं. जैसे मेरा एक व्यक्ति से सामना हुआ तो मैने उन्हे बाबा साहेब द्वारा आरबीआई, लेबर एक्ट, बाँध परियोजनाओं जैसे हीराकुंड, दमोदर घाटी, ग्रिड़ सिस्टम, वैधानिक हड़ताल का अधिकार इत्यादि के बारे मे बताया तो उन महाशय ने सब को एक बात से खारिज कर दिया “तुम हर बात पर अम्बेड़कर का लेबल क्यों लगा देते हो. ” ये भी मेरी आपकी तरह दलित ही हैं, महाशय एम.ए. कर रहे हैं इकोनोमिक्स मे. अब इनको लगता है की ज्यादा ज्ञानी हैं. इन्होंने बाबा साहेब की एक भी किताब नहीं पढी हुई होती है फिर भी ये उनके कामों को खारिज कर देते हैं. जब मैने पूछा की कोई एक वजह बता दो जिससे मैं मान लूँ की भारतीय नोट पर मि. गांधी की ही फोटो होनी चाहिए. क्या योगदान है उनका भारतीय अर्थव्यवस्था मे . वो नहीं बता सके. क्या परेशानी है अगर उनको मज़दूरों का उत्थान कर्ता कहा जाता है ? क्या दिक्कत है अगर वो हर तबके के नायक हैं ? बाबा साहेब ने हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ जरूर किया है चाहे वह कोयले की खान का मज़दूर हो, रेलवे का मजदूर हो, अधिकारी हो या कोई और. पर कुछ ज्ञानीजन चार अक्षर पढ कर कुछ लोग ज्ञान पेलने निकल पड़ते हैं.
ये दिक्कत उन लोगों मे मुख्यत: शुरु होती है जो हायर एजुकेशन ले रहे होते है. ऐसा क्यों ?  ज्ञान का भ्रम है और कुछ नहीं. उन्हे लग रहा होता है की उन जैसा दृष्टिकोण बाकी अन्य अम्बेड़करवादी या दलितों के पास नहीं है. ये लोग यह तक कह देते हैं की अम्बेड़कर न होते तो क्या हम भी नहीं होते? अम्बेड़कर न होते तो क्या हम चौदह घंटे ही काम करते ? चीजें बदल रही हैं..इत्यादि. फिर मुझे बताना पड़ता है की पैदा तो हम दलित हजारों सालों से होते रहे हैं पर जीते और मरते हम जानवरों की तरह ही आए हैं. पर सम्मान से जीने का अधिकार मिला तो बाबा साहेब की वजह से. हर वह काम जो बाबा साहेब ने किया उसका श्रेय सिर्फ बाबा साहेब को ही मिले. जिसे शर्म है वो अधिकारी या कर्मचारी छोड़ दे डीए को, विरोध करे वेतन इनक्रिमेंट का, विरोध करे मेडिकल सुविधाओं का. क्या क्या कर सकते हैं ये ज्ञानीजन ? सरकार या सेठ ओवर टाइम का पैसा न दे तो क्यों बैठ जाते हैं हड़ताल पर ? ये दलित ज्ञाता जानते भी थे मानव अधिकारों के बारे में ? हम लेबल लगाने वाले कौन होते हैं, सूरज को ढका जा सकता है ? उसके अस्तित्व को नकारा जा सकता है ? हम कृतज्ञ हैं उनके और रहेंगे. ये उस विद्वान को पढ़ते तब न कुछ समझ पाते. बहस मे ये आप को पागल तक भी करार दे देते हैं, कोई बडी बात नहीं. पर ये भी चलेगा. ये ही ज्ञानीजन या दलित छात्र कालांतर में चमचे बनते हैं. इनकी ये मूर्खता ज्यादा खतरनाक है,  जैसे घर का भेदी. कुछ के होश तो ऊँची पढ़ाई की एक रस्म ही ला देती है जिसे वायवा कहते हैं, कहीं कहीं यही काम सत्रांक कर देते हैं जहाँ इन के ज्ञान को चोट लगती है. छोटे कर्मचारियों की बात करने का तो मतलब ही नहीं बनता क्योंकि बडे अधिकारी ही रोते बिलबिलाते पाए जाते हैं. कुछ चमचागिरी करके सेवानिवृत्त हो लेते हैं और कुछ चमचागिरी की कमाई से एमएलए या एमपी हो जाते हैं फिर ये शो-केस के गुड्डे की तरह पडे होते हैं कोने में. बहुत बार मंच पर इनका हाथ झटक दिया जाता है, इन्हे छोड़ कर सब के गले मे माला डाली जाती है. यानी अछूत अब भी अछूत ही है. कभी कभी इन्हे भूल का एहसास हो जाता है पर इससे पहले ये वो खतरनाक काम कर देते हैं जिसे कहते हैं जड़ खोदना. जी हाँ जो आधा ज्ञान था इनको वो ये औरों को भी पिला चुके होते हैं. आप बाहर वाले दुश्मन से आराम से जीत सकते हैं बजाय घर के विभीषण से. इसलिए हर मौके पर ऐसे चमचो को जवाब देने के लिए तैयार रहें.
मेरा मानना है ये जो ज्योति जली है ज्ञान की और स्वाभिमान की वह किसी भी हालत मे न बुझे. हमारे बहुत सारे मित्र शानदार काम कर रहे हैं, आशावादी हूँ बेहतरी के लिए. शिक्षित होते रहिए, संघठन मे रहेंगे तो आसानी रहेगी संघर्ष करने मे.

अम्बेड़कर या भगवान अम्बेड़कर

एक बडा सा छायादार वृक्ष, हर कोई उसकी छाया मे बैठ सके, आराम कर सके. फिर प्रवेश होता है परजीवियों का अमरबेल कह लो, वो धीरे धीरे सारे वृक्ष पर छाती चली जाती है. अब कुछ सालों बाद वृक्ष मर जाता है और छाया की बात तो अब अतीत भी नहीं लगती. बाबा साहेब अपने कामों की वजह से अमर हुए पर अब उनको मार देने का काम चल रहा है. विचारों का खत्म हो जाना मृत्यु ही तो है. बाबा साहेब विचारों के माध्यम से हमारा मार्गदर्शन करते आ रहें हैं. अब उनके विचारों को बिल्कुल ही बदला जा रहा है, मै इसे मृत्यु से कम कुछ और कह ही नहीं सकता. 

 आपने अम्बेड़कर जयंती कैसे मनाई ? क्या आपने उनकी प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक किया ? नहीं ? ओ हाँ यह उनके विचारों के उलट है. ठिक वैसे ही जैसे मंदिर मे शराब और कबाब ? ठीक है मंदिर में शराब नहीं पी जा सकती, मांस नहीं खाया जा सकता तो हिंदुत्व का झंडा उठाने वालों की हिम्मत कैसे हुई दूध से बाबा साहेब की प्रतिमा को नहलाने की ? क्या एक अछूत को पवित्र किया जा रहा था ? मै इसे एक अपराध ही मानता हूँ. भीलवाडा मे काँग्रेस ने यह किया. इस घटिया काम के लिए 126 लीटर दूध जो की किसी और अच्छे काम मे लाया जा सकता था बेकार कर दिया गया. कहीं भजन संध्या का आयोजन हुआ, कहीं हिंदुत्व पर चर्चा, कहीं लड्डूओं का भोग. रायपुर मे सवर्ण महिलाओं ने 5100 कलशों की शोभा यात्रा निकाली.  लग रहा है जैसे हमे चिढाया जा रहा है की कर लो जो करना है हम बाबा साहेब का देवता बना कर ही रहेंगे. 

 आरएसएस ने बाबा साहेब का पुतला जलाया 1949 में, फिर आज क्यों उनको यह जयंती मनानी पडी ? कुछ मित्र कह सकते हैं की वोट बैंक का लफडा है, कुछ कह सकते हैं की बाबा साहेब के विचारों के आगे उनको झुकना ही पडा. ये तो ठीक है की वोट बैंक के लिए यह किया जा रहा है पर भीतर कुछ और बात है और वो यह की बाबा साहेब के विचारों को बदला जा रहा है. जिस हिंदुत्व के खिलाफ बाबा साहेब लिखते और बोलते रहे आज उन ही हिंदुवादी आयोजनो मे बाबा साहेब की प्रतिमा या तस्वीरें देखने को मिल रही है वहाँ विचारों से लेना देना नहीं है. 

 आज से पांच सौ या हजार साल बाद बाबा साहेब अम्बेड़कर को किस तरह याद किया जाएगा ? ये मेरा सवाल उन तमाम लोगों से हैं जो आज खुद को बाबा साहेब की विचारधारा का समर्थक मानते हैं, जो समानता की बात करते हैं, जो धर्म से आगे देश की बात करते हैं. शायद कुछ सालों बाद बाबा साहेब को भगवान का दर्जा देकर उनके मंदिर भी बना दिए जाएंगे, भजन सत्संग होंगे और क्या, हम फिर खुश, कहेंगे हमारे बाबा साहेब भगवान हो गए. फिर से गुलामी शुरू, समानता खत्म और सब कुछ फिर से भगवान भरोसे. भगवान यूँ ही बनाए जाते रहे हैं. ओर तब बाबा साहेब और उनके विचार पूरी तरह मर चुके होंगे. एसे मे कुछ दलित इतिहासकार अगर बचे होंगे तो बहस होगी की क्या अम्बेड़कर दलित थे. जी हां आज सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक पर इस ही तरह की बहस होती है. क्यों की और कोई तरीका नहीं है उस क्रांतिकारी विचारक, नेता और समाज सुधारक को मार डालने का, आरएसएस और तमाम मनुवादी इस रास्ते पर चल पडे हैं. इससे वोट भी मिल सकता है और भगवाकरण तो हो ही गया. आप को क्या जचता है बाबा साहेब अम्बेड़कर या भगवान अम्बेड़कर ? फर्क नहीं समझे ? बाबा साहेब तो किताबों से बाहर आ जाएंगे आपकी समानता की वकालत करने पर याद रहे आपके हक मे भगवान अम्बेड़कर कभी नहीं निकलेंगे मंदिर से. भगवान अम्बेड़कर के यहाँ लाइन होगी गरीब, अमीर, वीआईपी इत्यादि की. क्यों की आप दलित हैं आपको तो मंदिर मे जाने ही नहीं दीया जाएगा. वैसे जाकर करोगे भी क्या ? यदि गलती से भी भगवान अम्बेड़कर के मंत्र, चौपाई और भजन सुन लिए तो मार पडेगी मुफ्त मे. वैसे सुन कर करोगे भी क्या ? ये जो अधिकारों की बात करने लगे हो ना सब भूल जाओगे. मनुवादी अम्बेड़कर के जय करों के बीच  गुलामों की आवाज दब कर रह जाएगी.

हमे जो चाहिए वो ये की हम इस चाल को समझे, उन का जन्म दिवस हो या परिनिर्वाण दिवस, झूठे पांडित्य से दूर रखें व इस तरह के आयोजन का हर स्तर पर विरोध करें और मेरे ख्याल से न्यायालय भी इसका एक रास्ता है. थोडा थोडा बदलाव ही एक दिन बाबा साहेब का हर विचार बदल देगा. खतरा सामने है तय करो क्या चाहिए बाबा साहेब अम्बेड़कर या भगवान अम्बेड़कर. 

शिक्षा, संघठन और संघर्ष

 पहली पंक्ति मे गलियारे के पास वाली कुर्सी पर बैठा हूं, सारी कुर्सियाँ भरी हुई हैं. आईआईटी, एमबीबीएस, सीए, कमर्शियल पायलट, न्यायिक सेवा, आईएएस और भी न जाने कितनी ही परीक्षाओं मे परचम लहराने वाले दलित मित्र आए हैं. पोस्टर लगे हैं जिन पर लिखा है शिक्षित बनो, संघठित रहो, संघर्ष करो. कितना मनोरम दृश्य है, एक के बाद एक ओजस्वी भाषण दिये जा रहे हैं. पर पता नहीं मेरे हाथ उठ ही नहीं पा रहे हैं ताली बजाने को, सिर भी झुका जा रहा है. क्यों ? मंच से वक्ता, बाबा साहेब की उपलब्धियाँ गिनाते चले जाते हैं. ये उपलब्धियाँ तो उनकी हैं. हमने 1956, यानी बाबा साहेब जाने के बाद हमने क्या किया ? कितने कदम हम और चल सके ? कितने शिक्षित हुए, कितने संघठित हुए और कितना संघर्ष किया ? क्या हमारी उपलब्धियाँ रही बाबा साहेब के जाने के बाद ? मेरे पास जवाब नहीं है, दुखी हूँ . आप के पास जवाब है ? हमारे पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो कितना जायज है चिल्ला – चिल्ला कर, तालीयां पीट पीट कर बाबा साहेब की 126 वीं जयंती मनाना ? , 

हमने क्या किया बाबासाहेब के जाने के बाद ?

हममे से कुछ पढते चले गए, व्यक्तिगत लक्ष्यों और मत्वाकांक्षाओ पर ध्यान दिया, बहुत कम ही लोग तो ऊँचे पदों तक जा सके थे. उन मे से कुछ किसी राजनैतिक पार्टीयों की चमचागिरी कर राजनीति मे आ गए. फिर क्या हुआ ? एक दो मुख्यमंत्री तक पहुचे, बाकी इधर उधर एमएलए, एमपी बन घर चले गए. कितने प्रधानमंत्री दिये दलितों ने ? एक भी नहीं. क्या इतनी आबादी में से एक भी लायक उम्मीदवार नहीं मिला ? 

कुछ ने समाज की एकता के नाम पर महासंघों के पदों के मजे लिए. महासंघ क्या होते हैं, जानते भी थे ये लोग ? किसकी वजह से यह हो सका ? यही थी वह एकता, संघठन की ताकत जिस की बात बाबा साहेब ने की थी ? नहीं हम खुद को जात के बंधन से आजाद ही नहीं करना चाहते. इस वजह से हम कभी संघठित नहीं हो सके और बिना संघठन के संघर्ष  बेमतलब हो जाता है.

जिन पदों पर आरक्षण नहीं है जैसे उच्च न्यायालय, उच्च्तम न्यायालय, सीए और रक्षा क्षेत्र वहाँ क्या हालत है दलितों की ? सीए मे सारे सवर्ण भरे पडे हैं, बनियागिरी का ये काम उन ही के पास है आजभी. न्यायालयों मे सवर्ण ही भरे हैं, जज का बेटा वकील या जज बन जाता है. उच्चतम न्यायालय मे कितने मुख्य न्यायधीश बने इस समाज के, एक. कितने मेजर, कर्नल बनें बताओ ? हाँ सैनिकों से बहुत मिला हूं, बहुत हैं परिवार और गाँव मे. यह चेतना और ज्ञान की कमी का ही परिणाम है.

राजनैतिक पहलू

आरक्षण पर सरकारों का अलग अलग मत है. ज्यादातर दलित काँग्रेस को वोट देते आए हैं. बीजेपी कभी भी आरक्षण की पक्षधर नहीं रही है. इस ही लिए आरक्षण को हमेशा के लिए दफ्न करने का तरीका निकाल लिया है जिसे वो निजीकरण कहते हैं. हालही मे एक रेलवे स्टेशन को निजी कर दिया गया है, राजस्थान मे तो जंगल ही निजी हाथों मे दिये जा रहे हैं. बैक लोग भर्तीयां नहीं भरी जा रही हैं, गेट परीक्षा मे ओबीसी कोटा खत्म, यूपी मे प्राइवेट मेडिकल कालेज पीजी एडमिशन मे एससी, एसटी व ओबीसी कोटा खत्म, यूपी न्यायिक परीक्षा 2016 मे एक भी एससी, एसटी छात्र पास नहीं किया गया. 40 मे से 39 सामान्य से हैं, एक ओबीसी से है. यह साजिश ही तो है धीरे धीरे आरक्षण खत्म करने की. वो हमे आगे लाना नहीं चाहते हम संघर्ष कर आगे आना नहीं चाहते. बीएसपी आरक्षण की समर्थक है पर वह यूपी के अलावा किसी अन्य राज्य में उतनी सक्रिय नहीं है. 

राजेनैतिक चमचे आजकल आरक्षण पर ज्ञान बाँटते हुए पाए जाते हैं. अगर आरक्षण न होता तो क्या वे अफसर या राजनेता बन सकते थे, नहीं. हमे उनको उनके हाल पर छोड देना है, उन्हे वोट न दिया जाए. समय ही कितना लगेगा फिर उनका किस्सा खत्म होने में. 

क्या होना चाहिए था ?

  • बजाय जातिगत संघ बनाने के हमको सुनिश्चित करना चाहिए था की हर बच्चे को शिक्षा मिले, उनको पहले ही पता होना चाहिए था की उनका मुकाबला किन लोगों से पड़ने वाला है. हम उनको बहतर मार्गदर्शन दे सकते थे. 
  • हम गांव गांव  मे पुस्तकालय खोल सकते थे, जहाँ कोई भी कभी भी जा कर पढ सके. मैने बाबा साहेब के बारे मे सिर्फ एक बात पढी वह थी ” भीम राव अम्बेड़कर संविधान सभा की प्रारूप समिती के अध्यक्ष थे.” क्यों हमे उनके बारे मे ज्यादा नहीं पढाया जाता ? गुजरात मे बीजेपी सरकार ने बकायदा इस बात के जवाब मे कहा है की ऐसा करने से बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पडता है. मै इसे समझ सकता हूँ, बालक उन्हे पढने के बाद किसी का भी गुलाम रह ही नहीं सकता. पर सरकारें यही चाहेगी पर हम बच्चों को दलित नायकों और दलित साहित्य के बारे मे बता सकते थे. पर हम ने यह भी नहीं किया.
  • महिला शिक्षा पर हम ने क्या किया ? बिना महिलाओं को शिक्षित किए हम दलित समाज को शिक्षित कर सकते हैं, नहीं. तो क्यों आज भी महिला साक्षरता दर कम है. हम सरकारों के भरोसे ही रहते आए हैं. 
  • जो लोग आगे बढ गए क्या उनका फर्ज नहीं की वो आरक्षण का खुल कर समर्थन करें तथा अपने भाईयों और बहनो की आगे बढने मे सहायता करे ? हम या तो अपनी पारिवारिक जिम्मेदारीयों मे व्यस्त हो जाते हैं या चमचे बन जाते हैं. खुदगर्ज हैं हम. अगर बाबा साहेब भी यही करते तब ?

हजरों साल पुरानी गुलामी की बेडीयां तोड हमे आजाद करने वाले बाबा साहेब ने पूरी मनुवादी व्यवस्था को घुटनो पर ला दिया ओर एक हम हैं जो इतने हो कर भी  कुछ नही कर रहे, धिक्कार है जो हम वो आजादी न बचा सकें. फिर से गुलाम बना लेने की तैयारी चल रही है. हमारी राजनैतिक व सामाजिक उदासीनता हमारी सामूहिक खुदखुशी बने उससे पहले जागने की जरूरत है.

सोचते सोचते कहाँ आ निकला हूँ, प्रतिभावान छात्र छात्राएं ईनाम हाथ में लिए घर को चले जा रहे हैं, कुर्सियाँ खाली हो चुकी हैं. अलार्म अब भी बज रहा है, बिस्तर मे लेटा हुआ सोच रहा हूँ क्या करूँगा वहाँ जाकर. घर पर ही बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण करूँ तो ? चलना ही बहतर होगा शायद. देखता हूँ  क्या हो सकता है.

गौ माता

कुछ लोग शायद विकासवाद को नही समझते माता हमारी प्लास्टिक खा रही है तो यह न समझना हमे पता नही है, इसके परिणाम अच्छे ही होंगे  भले ही दूरगामी हों. कैसे ? अरे यही तो है विकासवाद, एक दिन गाय माता प्लास्टिक को पचा लेने मे सक्षम हो जाएगी तब प्लास्टिक का कचरा पर्यावरण को नुकसान भी नही पहुचा सकेगा. उस दिन हमको चारे की परवाह करने की भी जरुरत नही होगी, वैसे भी चरागाह रह ही कितने गए हैं. तब हम फिर से विश्वगुरू के रूप मे पहचाने जाएंगे. बताओ कुछ गलत है इसमे हां कभी कभी कोई इक्की दुक्की गाय प्लास्टिक खा के मर जाती है.

और जो तुम ये कहते हो लावारिस गाय सडक पर घूम रही है, दरअसल वह स्वतंत्रता है. वह इतनी स्वतंत्र है की कचरे मे से भी खाना ढूँढ ले, कहीं भी रात गुजार ले. सडक पर चलना केवल आदमी का ही अधिकार तो नही और जब हाथी और घोडे सडक पर चले तो कोई बात नहीं  तुम्हारी परेशानी बस गाय है. आदमी सडक किनारे शौच कर सकता है तो गाय क्यों नहीं ?  

 बीफ – बीफ करते हो न तुम क्यों खाते हो गौवंश को ? केरल, नागालैन्ड़, मणिपुर, अरुणाचल, आसाम आदि का मामला अलग है. केरल मे चुनाव का लफडा है, वोट मांगने हैं सो कह दिया की हम कमल वाले आप के लिए अच्छे बीफ की व्यवस्था करेंगे. अब ये सवाल मत करना की क्यों उत्तर भारत मे बीफ पर जूते चल जाते हैं फिर क्यों पूर्वोत्तर मे लोग बीफ मजे से खाते हैं ? देखो मायने ये रखता है की कैसे जनता को बेवकूफ बनाया जा सकता है, कैसे उनके गुस्से को वोट मे बदला जा सकता है. बीफ निर्यात मे कितना नाम कमाया हमने मालूम भी है ? कितने सवर्ण हिंदू, जैन लगे पडे हैं इस कारोबार मे जानते भी हो ? हमारी माँ है हम जो चाहे करें पर तुम मुसलमान तो दूर ही रहना. 

विलाप क्यों करते हो जो कल कोई मारा गया था. गौरक्षक थे खूब मारा, पुलिस भी नही मारती इतना मारा, मारते क्यों न मुसलमान थे , गौ माता को ले जा रहे थे. अरे वो खूब गिड़ गिडाए की हमने पालने के लिए खरीदी है, नगर निगम से खरीद की रसीद भी दिखाई. बताया की डेयरी का काम करते हैं पर वो बेचारे क्या जाने मुसलमान को गाय पालनी भी नही है. गुस्सा बढता गया और वो पीटते गए. पहलू खाँ मारा गया, उन मे से एक अर्जुन नाम का लडका था उसे जाने दिया, हिंदू था ना इसलिए. हिंदू पालता है गाय और वही पाले बस. मुसलमान तो दूर ही रहे गाय के नाम से भी. इंसान की जान क्या मायने रखती है इस नश्वर दुनिया मे ? शक के दायरे मे ही अखलाख को मारा था और अब पहलू, कुछ समझे ? अरे गाय तो बहाना है इनका असली मकसद तो मुसलमान और दलितों को निशाना बनाना है. वरना ऊना मे इतना हुड दंग क्यों होता वहाँ तो गाय पहले से मरी हुई थी ? समझो बात को.

उन तथाकथित गौरक्षकों को संघ और सरकार का संरक्षण प्राप्त है हां दिखावे के लिए देश के पीएम बाद मे गौरक्षकों को थोडा डाँट लेते हैं, करना पड रहा है जी. जब देश मे सब तरफ कमल होगा तब उनको यह नाटक भी नहीं करना पडेगा. राजस्थान के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने तो कार्यवाही का समर्थन तक किया है बस कानून हाथ मे लेने को जरूर गलत बताया है. इस से क्या पता लगता है ? यही के सरकार भी नहीं चाहती के मुसलमान गाय रखें. राज्यसभा मे नकवी साहब ने कहा की ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, बनना पडा धृतराष्ट्र, बनना ही पडेगा. पद और सत्ता की लालसा मे इतन अंधा-बहरा भी बनना पडता है की अपने लोगों की चीख पुकारों को भी अनसुना किया जा सके.

तय दलितों और मुसलमानों को करना है वे मरते रहेंगे या आवाज उठा कर इन कृत्यों के विरुद्ध आवाज उठाएंगे.

चार पाहिए

जब एक आदमी ही सरकार हो या देश हो तो समझ लें की देश दुर्गति की तरफ बढ रहा है. सीट की पेटी बाँध कर भी आप कुछ नहीं कर सकोगे. फोर व्हील ड्राइव मे अगले और पिछले पाहियों को अलग से पावर दी जाती है ताकि खराब रास्तों पर बिन फसे चल सके. कुछ ऐसी ही फोर व्हील ड्राइव बनाई गई थी संविधान. जिसका चौथा पाहिया बना मीडिया इसमे मिलावट की संभावना सब से कम थी. पर आज सभी पाहिए अपनी स्वतंत्रता खो चुके हैं. कुछ लोग ही गुलाम बने रहना चाहते हैं. इस गुलामी के भी अपने मजे हैं. सच मे, एक पत्रकार महाशय तो तिहाड भी जा चुके है घूस के चक्कर मे पर अभी उन्हे जेड सुरक्षा प्राप्त है. इन लोगो के अलावा भी कई और हैं जो चमचे बने हुए हैं मोदी के. थोडे ही दिनो पहले इंटरव्यू हुआ था साहब का, अर्णव गोस्वामी ने बहुत सलीके से वो स्क्रिप्टेड इंटरव्यू लिया गया था. 

न्याय मे भी सरकारी दखल जबर्दस्त तरीके से बढगया है. अगस्ता वास्टलेन्ड वाले मामले मे कोर्ट डायरी को सबूत मान लेती है वहीं सहारा और बिडला मोदी घूस वाले मामले मे कोर्ट डायरी को सबूत मानने से मना कर देती है, समझ के बाहर है. 

अम्मा और शशीकला का मामला है 1996 का पर इतने पुराने केस मे शशीकला को जेल भेजा गया है तो क्यों गोधरा कांड 2002 को री ओपेन किया जाता, जबकी सब जानते हैं की मोदी को किस हद तक जाकर बचाया गया है.

इसके अलावा दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत एवं आरएसएस के सदस्यों को मालेगांव धमाके में गिरफ्तार किया गया था। इस पूरे मामले की जांच हेमंत करकरे ने की थी वही हेमंत जिसने 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले मे अपने प्राण देश के लिये बलिदान किये. कोई उस जांच पर सवाल उठा सकता है ? प्रग्या ठाकुर भी गिरफ्तार की गई थी. आठ सालों से जेल मे थी एक दिन रिहा कर दि जाती है. असीमानंद जो की मेलगांव, अजमेर धमकों का आरोपी था उसे भी पिछले साल सितम्बर मे बेल मिल जाती है.

ये सब क्या है ? पहले केस कमजोर करो जैसे प्रग्या ठाकुर पर से मकोका हटाया गया फिर चुप के से बरी कर दो. सवाल फिर वही है धमाके या दंगे किये किसने किस की शह पर ? 

अगले अध्याय लिखते हुए आरएसएस के ग्यारह लोग जासूसी करते हुए पकडे गए हैं और वो भी पाकिस्तान के लिए. इसमे लिप्त लोगो की लिस्ट लम्बी हो सकती है, अखबारों की पंक्तियां छोटी होती जा रही हैं. कुछ नाम विश्वहिंदू परीषद के लोगो के भी हैं. ये वही राष्ट्रवादी लोग हैं जो गाली के अलावा आपको देशभक्त होने का प्रमाण पत्र या पाकिस्तान का वीजा हाथो हाथ दे देते हैं. सब आरएसएस वालों को सांप सूंघ गया है ? नही वो अपने आदमीयों को बचाने मे लगे हैं. हम बात भूलते जाते हैं और फिर हर बार की तरह ये लोग भी जेल से बाहर होंगे. कोर्ट, अखबार, जांच एजेंसियां सब मिल कर काम करेंगी. जेएनयू के छात्र उमर खालिद का संबन्ध पाक से है ये बकवास इन लोगो ने उछल उछल कर कही थी. हर टीवी चैनल पर हल्ला हुआ फिर इस बार इतना सन्नाटा क्यों है भाई ? राष्ट्रवादी जुबान पर छाले पड़ गए ? मुझे जज भी दूध के धुले नही लगते वरना क्यों जज का बेटा ही जज बनता ? जज भी इंसान है आखिर दिल उसके पास भी है और दिल है तो मचल भी सकता है. पैसे और रिटायरमेंट के बाद का जुगाड़ उसको भी करना है राजनेता बनना है. फिर उम्मीद किस से की जा सकती है ?